विश्वामित्रः [विश्व+मित्रः, विश्वमेव मित्रं यस्य ब० स०, पूर्वपदस्याकारस्य दीर्घः]
एक विख्यात ऋषि का नाम । यह कान्यकुब्ज का राजा होने के कारण क्षत्रिय था. इसके पिता का नाम गााधि था । एक बार यह मृगया के लिए घूमता–घूमता वसिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुँचा, वहां अनेक गौओं को देख कर उसने अनंत धन राशि देकर भी उनको लेना चाहा और न मिलने पर बलात् उनको छीनने का प्रयत्न किया । इस बात पर एक महान् संघर्ष हुआ, और राजा विश्वामित्र पूर्णरूप से परास्त हो गया । इस पराजय से विश्वामित्र अत्यंत क्षुब्ध हुआ और साथ ही वसिष्ठ के ब्राह्मणत्व की शक्ति से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि वह ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करता रहा । यहां तक कि बाद में उसे क्रमशः राजर्षि, ऋषि, महर्षि और ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली, परन्तु उसे सन्तोष न हुआ क्योंकि वसिष्ठ ने अपने मुख से उसे ब्रह्मर्षि नहीं कहा । विश्वामित्र हजारों वर्ष तपस्या करता रहा, तब कहीं जाकर वसिष्ठ ने उसे ब्रह्मर्षि कहा । विश्वामित्र ने कई बार वसिष्ठ को उत्तेजित करने का प्रयत्न किया, उदाहरणतः वसिष्ठ के सौ पुत्रों को विश्वामित्र ने मौत के घाट उतार दिया, परन्तु वशिष्ठ तब भी नहीं घबराया । अन्तिमरूप से ब्रह्मर्षि बनने से पहले विश्वामित्र की शक्ति बहुत अधिक थी, उदाहरणतः उसने त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने, इन्द्र के हाथ से शुनःशेपकी रक्षा करने, तथा ब्रह्मा की भांति पुनः सृष्टि की रचना करने में अत्यधिक बल का प्रदर्शन किया । यह बालक राम का साथी और परामर्श दाता था, इसने राम को अनेक आश्चर्य जनक अस्त्र प्रदान किये) ।