संस्कृत-शब्दकोशः

वैतालिक वैत्रक

वैतालीय

वैतालीय परि०-
“षड्विषमेष्टौ समे कलास्ताश्च समे स्युर्नो निरन्तराः।
न समाऽत्र पराश्रिता कला वैतालीयेऽन्ते रलौ गुरुः ॥”
यह चार चरण का श्लोक है । इसके प्रथम तथा तृतीय चरण में चौदह लघु मात्राओं का समय लगता है, और द्वितीय तथा तृतीय चरण में सोलह मात्राओं का । पुन: प्रथम तथा तृतीय चरण में छः मात्राएं होनी चाहिए । द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में आठ मात्राएँ और उसके पश्चात् रगण० (ऽ।ऽ) तथा लघु गुरु (।ऽ) होने चाहिए । आगे नियम इस बात की अपेक्षा करते है कि सम चरणों में सभी मात्राएँ ह्रस्व या दीर्घ नहीं होनी चाहिए, इसके अतिरिक्त प्रत्येक सम चरण की (अर्थात् द्वितीय, चतुर्थ तथा छठा चरण) मात्राएँ अगले चरणों (अर्थात् तृतीय, पंचम और सप्तम) से संयुक्त नहीं होनी चाहिए । उदा०-
“कुशलं खलु तुभ्यमेव तद् वचनं कृष्ण यदभ्यधामहम्।
उपदेशपराः परेष्वपि स्वविनाशाभिमुखेषु साधवः ॥”
शि० १६।४१॥



Correction: