शस् (भ्वा० पर० शसति) काटना, मारडालना, नष्ट करना,
वि–
काट डालना, मार डालना–उत्तर०४ ।
ii (अदा० पर० शस्ति) सोना, तु० 'शंस्' से भी ।
शंस् (भ्वा० पर० शंसति, शस्त, कर्मवा० शस्यते)
1. प्रशंसा करना, स्तुति करना, अनुमोदन करना –साधु साध्विति भूतानि शशंसुर्मारुतात्मजम् –राम०, भग० ५।१
2. कहना, बयान करना, अभिव्यक्त करना, प्रकथन करना, संसूचित करना, घोषणा करना, विवरण देना (संप्र० या कभी संबं० के साथ अथवा स्वतंत्र रूप से) –शशंस सीता परिदेवनान्तमनुष्ठितं शासनमग्रजाय –रघु० १४।८३, न मे ह्रिया शंसति किंचिदीप्सितम् –३।५, २।६८, ४।७२, ९।७७, ११।८४, कु० ३।६०; ५।५१
3. संकेत करना, कह रखना, जताना –यः (अशोकः) सावज्ञो माधवश्रीनियोगे पुष्पैः शंसत्यादरं त्वत्प्रयत्ने –मालवि० ५।८, कि० ५।२३, कु० २।२२
4. आवृत्ति करना, पाठ करना
5. चोट मारना, क्षति पहुँचाना
6. बुरा भला कहना, बदनाम करना,
अभि–
1. अभिशाप देना
2. दोषारोपण करना, निन्दा करना, बदनाम करना –याज्ञ० ३।२८६
3. प्रशंसा करना,
आ–
(प्रायः आ)
1. आशा करना, प्रत्याशा करना, इच्छा करना, अभिलाषा करना –स्वकार्यसिद्धिं पुनराशशंसे –कु० ३।५७, संग्रामं चाशशंसिरे –भट्टि० १४।७०, ९०, मनोरथाय नाशंसे किं बाहो स्पन्दसे वृथा –श० ७।१३, २।१५
2. आशीर्वाद देना, सदिच्छा प्रकट करना, मंगलकामना करना –एवं ते देवा आशंसन्तु –मृच्छ०
1. राज्ञः शिवं सावरजस्य भयादित्याशशंसे करणैरबाह्यैः –रघु० १४।५०
3. कहना, वर्णन करना –आशंसता वाणगतिं वृषांके कार्यं त्वया नः प्रतिपन्नकल्पम् –कु० ३।१४
4. प्रशंसा करना
5. दोहराना,
प्र–
सराहना, स्तुति करना, अनुमोदन करना, गुणकथन करना, श्लाघा करना –हरिणायुवतिः प्रशशंसे –गीत० १, यच्च वाचा प्रशस्यते –मनु० ५।१२७, प्रांशंसीत्तं निशाचरः–भट्टि० १२।६५, रघु० ५।२५, १७।३६ ।
शंस् (भ्वा० पर०) उन ऋग्मन्त्रों में स्तुति गान करना जो गायन के लिए निर्धारित नहीं किये गये –अप्रगीतेषुशंसति –मै० सं०७।२ ।१७ पर शा० भा०।
परिशिष्ट