शूल (पुं०/नपुं०) [शूल्+क]
1. पैना या नोकदार हथियार, नुकीला काँटा, नेजा, बर्छी, भाला
2. शिव का त्रिशूल
3. लोहे की सलाख (जिस पर मांस भूना जाता है) शूले संस्कृतं शूल्यम्–तु० अयः शूल
4.एक स्थूण जिसके सहारे अपराधियों को सूली दी जाती थी–(बिभ्रत्) स्कन्धेन शूलं हृदयेन शोकम् –मृच्छ० १०।२१, कु० ५।७३
5. तीव्र पीड़ा
6. उदरशूल
7. गठिया, जोड़ों में दर्द
8. मृत्यु १. झण्डा, ध्वज (‘शूलाकृ’ लोहे की सलाख पर रख कर भूनना) ।
समस्त पद
~अग्रम्
सलाख की नोक,
~ग्रन्थिः
(स्त्री०) एक प्रकार का घास, दूब,
~घातनम्
लोहे का बुरादा, लोहे का चूरा जो लोहे को रेतने से निकलता है,
~घ्न
(वि०) शामक औषधि, वेदनाहर,
~धन्वन्, ~धर, ~धारिन्, ~धृक्, ~पाणि, ~भृत्
(पुं०) शिव के विशेषण –अधिगतधवलिम्नः शूलपाणेरभिख्याम्–शि० ४।६५, रघु० २।३८,
~शत्रुः
एरण्ड का पौधा,
~स्थ
(वि०) सूली पर चढ़ाया गया,
~हन्त्री
एक प्रकार का जौ,
~हस्तः
भालाधारी ।
शूल: [शूल्+क]
1. विक्रय
2. वेचने योग्य पदार्थ
3. नोकदार हथियार
4. लोहे की सलाख (जिस पर रख कर माँस भूना जाता है)
5. किसी भी प्रकार का दर्द
6. मृत्यु ।
समस्त पद
~अङ्कः
शिव का विशेषण –ये समाराध्य शूलाङ्क –महा० १०।७।४७,
~अवतंसितं
(वि०) सलाख पर लटकाया हुआ, सूली पर चढ़ाया हुआ,
~आरोपः
सूली पर चढ़ाना ।
परिशिष्ट