शृङ्गार: [शृङ्गं कामोद्रेकमृच्छत्यनेन ऋ+अण्]
प्रणयरस, कामोन्माद, रतिरस (काव्यरचनाओं में वर्णित आठ या नौ प्रकार के रसों में सबसे पहला रस, यह दो प्रकार का है–संभोग शृंगार और विप्रलंभ शंगार) –शृङ्गारः सखि मूर्तिमानिव मधो मुग्धौ हरिः क्रिडति –गीत० १, (इसकी परिभाषा यह है–
“पुंसः स्त्रियां स्त्रिया: पुंसि संभोगं प्रति या स्पृहा ।
स शृङ्गार इति ख्यातः क्रीडारत्यादिकारकः ॥”
दे० सा० द० २१० भी)
2. प्रेम, प्रणयोन्माद संभोगेच्छा –विक्रम० १।९
3. शृङ्गारिक समालापों के उपयुक्त वेश, वेशभूषा
4. मैथुन, संभोग
5. हाथी के शरीर पर बनाये गए सिंदूर के निशान
6. चिह्न,
~रम्
1. लौंग
2. सिंदूर
3. अदरक
4. शरीर या वस्त्रों के लिए सुगन्धित चूर्ण
5. काला अगर ।
समस्त पद
~चेष्टा
कामानुरक्ति का संकेत – रघु० ६।१२,
~भाषितम्
प्रेमालाप, प्रणयकथा,
~भूषणम्
सिंदूर,
~योनि
कामदेव का विशेषण,
~रसः
साहित्यशास्त्र में वर्णित शृङ्गाररस, प्रणयरस,
~विधिः, ~वेशः
प्रेमालापों के उपयुक्त वेशभूषा (जिसे पहन कर प्रेमी अपने प्रिय से मिलता है)
~सहायः
प्रेमव्यापार में सहायक व्यक्ति, नर्मसचिव ।