शेष (वि०) [शिष्+अच्]
बचा हुआ, बाकी, अन्य सब -न्यषेधिशेषोप्यनुयायिवर्गः–रघु० २।४, ४।६४, १०।३०, मेघ० ३०।८७, मनु० ३।४७, कु० २।४४; इस अर्थ में प्रायः समास के अन्त में–भक्षितशेष, आलेख्यशेष, आदि,
~षः, ~षम्
1. बचा हुआ, बाकी, अवशिष्ट –
“ऋणशेषोऽग्निशेषश्च व्याधिशेषस्तथैव च ।
पुनश्च वर्धते यस्मात्तस्माच्छेषं न कारयेत् ॥”
– चाण० ४०, अध्वशेष –मेघ० २८, विभागशेष – कु० ५।५७, वाक्यशेषः –विक्रम०३
2. छोड़ी हुई कोई बात, या भूली हुई बात, ('इतिशेषः' बहुधा भाष्यकारों द्वारा रचना को पूरा करने के लिए किसी आवश्यक न्यून पद की पूर्ति करने के निमित्त प्रयुक्त होता है)
3. बचाव, मुक्ति, श्रान्ति,
~षः
1. परिणाम, प्रभाव
2. अन्त, समाप्ति, उपसंहार
3. मृत्यु, विनाश
4. एक विख्यात नागका नाम, जिसके एक हजार फणों का होना कहा जाता है, तथा जिस का वर्णन विष्णु की शय्या के रूप में, या समस्त संसार को अपने सिर पर सम्भाले हुए मिलता है–किं शेषस्य भरव्यथा न वपुषि क्ष्मां न क्षिपत्येष यत्–मुद्रा० २।१८, कु० ३।१३, ६।६८, मेघ० ११०, रघु० १०।१३
5. बलराम (जो शेष का अवतार माना जाता है,
~षा
फूल तथा अन्य चढ़ावा जो मूर्ति के सामने प्रस्तुत किया जाता है) और उसके पुण्य अवशेष के रूप में पूजा करने वालों में बाँट दिया जाता है–श० ३, कु० ३।२२,
~षम्
उच्छिष्ट अन्न, चढ़ावे का अवशेष (‘शेषे’ क्रिया विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, इसका अर्थ है–1. अन्त में, आखिरकार
2. अन्य विषयों में) ।
समस्त पद
~अन्नम्
जूठन,
~अवस्था
बुढ़ापा,
~भागः
शेष, बाक़ी,
~भोजनम्
जूठनखाना,
~रात्रिः
रात का चौथा पहर,
~शयनः, ~शायिन्
(पुं०) विष्णु के विशेषण ।
शेषः [शिष्+अच्]
1. अङ्गभूत वस्तु
2. प्रसाद, कृपा ।
परिशिष्ट