श्रवण (पुं०/नपुं०) [श्रु+ल्युट्]
1. कान–ध्वनति मधुप समूहे श्रवणमपि दधाति–गीत० ५
2.किसी त्रिकोण का कर्ण,
~णः, ~णा
इस नाम का नक्षत्र (जिसमें तीन तारे सम्मिलित है),
~णम्
1. सुनने की क्रिया, –श्रवणसुभगम् –मेघ० ११
2. अध्ययन
3. ख्याति, कीर्ति
4. जो सुना गया या प्रकट हुआ, –वेद, इति श्रवणात् 'वैदिक पाठ ऐसा होने के कारण'
5. दौलत ।
समस्त पद
~इन्द्रियम्
श्रोत्रेन्द्रिय, कान,
~उदरम्
कान का बाह्यविवर,
~गोचर
(वि०) श्रवणपरास के अन्तर्गत
(–रः)
सुनाई देने की सीमा तक, यथा 'श्रवणगोचरे तिष्ठ', अर्थात् जहाँ तक सुनाई देता रहो वहीं तक रहो,
~पथः, ~विषयः
कान की पहुँच, श्रवण परास –वृत्तान्तेन श्रवणविषयप्रापिणा–रघु० १४।८७,
~पालि:, –ली
( स्त्री०) कान का सिरा,
~सुभग
(वि०) कर्णसुखद ।
श्रवणः [श्रु+ल्युट्]
1. कान
2. त्रिकोण की एक रेखा
3. सुनने की क्रिया ।
समस्त पद
~पुटकः
कर्णविवर,
~पूरकः
कान की बाली, कर्णफूल,
~प्राघुणिकः
श्रवण गोचर वस्तु, कानों में आना,
~भृत
( वि० ) कहा गया ।
परिशिष्ट
श्रवणम् [श्रु+ल्युट्]
1. कान
2. त्रिकोण की एक रेखा
3. सुनने की क्रिया ।
समस्त पद
~पुटकः
कर्णविवर,
~पूरकः
कान की बाली, कर्णफूल,
~प्राघुणिकः
श्रवण गोचर वस्तु, कानों में आना,
~भृत
( वि० ) कहा गया ।
परिशिष्ट