श्रि (भ्वा० उभ० श्रयति-ते, श्रितः, प्रेर० श्राययति-ते, इच्छा० शिश्रीषति-ते, शिश्रयिषति-ते) जाना, पहुँचना, सहारा लेना, दौड़ होना, बचाव के लिए पहुँच होना,–यं देशं श्रयते तमेव कुरुते बाहुप्रतापार्जितम्–हि० १।१७१, रघु० ३।७०, १९।१
2. जाना, पहुँचना, भुगतना, (अवस्था) धारण करना – परीता रक्षोभिः श्रयति विवशा कामपि दशाम् –भामि० १।८३, द्विपेन्द्रभावं कलभः श्रयन्निव –रघु० ३।३२
3. चिपकना, झुकना, आश्रित होना, निर्भर रहना –उत्तर० १।३२
4. निवास करना, बसना
5. सम्मान करना, सेवा करना, पूजा करना
6. सेवन करना काम पर लगाना,
7. संलग्न करना, अनुषक्त होना ।
अधि–
1. निवास करना
2. सवारी करना, चढ़ना,
आ–
1. सहारा लेना, आश्रय लेना, अवलम्ब होना, विक्रम० ५।१७, भट्टि० १४।१११
2. अनुगमन करना–रघु० ४।३५
3. शरण लेना, निवास करना, बसना–रघु० १३।७, पंच० १।५१
4. आश्रित होना,– मनु० ३।७७
5. पार जाना, अनुभव प्राप्त करना, भुगतना, धारण करना– एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्भिन्नः पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान्–उत्तर० ३।४७
6. जमे रहना, डटे रहना
7. चुनना, छांटना, पसन्द करना
8. सहायता करना, मदद करना,
उद्–
ऊपर उठाना, उन्नत करना, ऊंचा करना,
उपा–
पहँच या अवलम्ब होना,–भग० १४।२, उत्तर० १।३७,
सम्–
1. पहुँच होना, सहारा होना, शरण में जाना, सहायता के लिए पहुँचना
2. अवलम्बित होना, आश्रित होना –उत्तर० ६।१२, मा० १।२४
3. हासिल करना, प्राप्त करना
4. अभिगमन करना, संभोग के लिए पहुँचना
5. सेवा करना ।