मृदु (वि०) (स्त्री० –‘दु’, –‘द्वी’) [मृद्+कु]
(म० अ० म्रदीयस्, उ०अ० म्रदिष्ठ)
1. चिकना, कोमल, पतला, लचीला, सुकुमार–मृदु तीक्ष्णतरं यदुच्यते तदिदं मन्मथ दृश्यते त्वयि–मालवि० ३।२, अथवा मृदु वस्तु हिंसितुं मृदुनैवारभते प्रजान्तकः–रघु० ८।४५, ५७ श० १।१०, ४।१०,
2. कोमल, सुकुमार, नम्र –न खरो न च भूयसा मृदु:–रघु० ८।९; बाणं कृपामृदुमनाः प्रतिसंजहार–९।४७ 'दया के कारण कोमल मन वाला' ११।८३, श० ६१ महर्षिर्मृदुतामगच्छत् –रघु० ५।५४, 'दयार्द्र' –खातमूलमनिलो नदीरयैः पातयत्यपि मृदुस्तटद्रुमम् –११।७६, 'मृदु और मन्द पवन भी'
3. दुर्वल, कमज़ोर–सर्वथा मृदुरसौ राजा–हि० ३, ततस्ते मृदवोऽभूवन् गन्धर्वाः शरपीडिता:–महा०
4. मध्यम, संयत,
~दुः
शनिग्रह,
~दु
(अव्य०) कोमलता से, मन्दस्वर में, मधुर ढंग से –स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचरः –श० १।२३, वादयते मृदु वेणुम्–गीत० ५ ।
समस्त पद
~अङ्ग
(वि०) कोमल अंगों वाला,
(–गम्)
टीन, जस्त
(–गी)
कोमल अंगों वाली स्त्री,
~उत्पलम्
कोमल अर्थात् नीलकमल,
~कार्ष्णायसम्
सीसा,
~कोष्ठ
(वि०) नरम कोठे वाला जिसे हलके विरेचन से दस्त आ जाय,
~गमन
(वि०) मन्द या अलसपूर्ण चाल वाला,
(–ना)
हंसी, राजहंसी,
~चर्मिन्, ~छदः, ~त्वच्, ~त्वचः
(पुं०) एक प्रकार के भोजपत्र का वृक्ष,
~पत्रः
सरकंडा या नरकुल,
~पर्वकः, ~पर्वन्
(नपुं०) नरकुल, बेंत,
~पुष्पः
शिरिष का वृक्ष,
~पूर्व
(वि०) जो आरंभ मे मंद हो, स्निग्ध हो, सौंम्य तथा सुहावना हो,
~भाषिन्
(वि०) मधुर बोलने वाला,
~रोमन्(पुं०), ~रोमकः
खरगोश,
~स्पर्श
(वि०) छूने में नरम ।