संस्कृत-शब्दकोशः

श्रीहर्ष श्रुघ्निका

श्रु

श्रु
i (भ्वा० पर० श्रवति) जाना, हिलना, जुलना–तु० ‘स्रु’ ।
ii (स्वा० पर० शृणोति, श्रुत)
1. सुनना, (ध्यानपूर्वक) श्रवण करना, कान देना–शृणु मे सावशेषं वचः – विक्रम० २, रुतानि चाश्रोषत षट्पदानाम्–भट्टि० २।१०, संदेशं मे तदनु जलद श्रोष्यसि, श्रोत्रपेयम्–मेघ० १३
2. अधिगम करना, अध्ययन करना– द्वादशवर्षभिर्व्याकरणं श्रूयते– पंच० १
3. सावधान होना, आज्ञा मानना (इतिश्रूयते–ऐसा सुना जाता है अर्थात् वेदों में इसका विधान है, ऐसा धर्मविधि), प्रेर० (श्रावयति-ते) सुनवाना, समाचार देना, कहना, बयान करना– इच्छा० (शुश्रूषते)
1. सुनने की इच्छा करना
2. सावधान होना, आज्ञाकारी होना, हुक्म मानना – पंच० ४।७८
3. सेवा करना, सेवा में उपस्थित रहना–शुश्रूषस्व गुरून्–श० ४।१७, कु० १।५९, मनु० २।४४,
अनु–
1. सुनना –मनु० ९।१००, तद्यथानुश्रूयते–पंच० १
2. गुरुपरम्परा से प्राप्त,
अभि–
1.सुनना
2. ध्यान देकर सुनना,
आ–
1. सुनना
2. प्रतिज्ञा करना (व्यक्ति में संप्र०)–याज्ञ० २।१९६, तु० पा० १।४।४०,
उप–
1. सुनना
2. जाना, निश्चय करना–केशिना हृतामुर्वशीं नारदादुपश्रुत्य गन्धर्वसेना समादिष्टा –विक्रम० १,
परि–
सुनना,
प्रति–
प्रतिज्ञा करना (उस व्यक्ति में संप्र० जिसके लिए प्रतिज्ञा की जाय–तस्यै प्रतिश्रुत्य रघुप्रवीरस्तदीप्सितम्–रघु० १४।२९, २।५६, ३।६७ १५।४,
वि–
सुनना (प्रायः क्तांत रूप प्रयुक्त),
सम्–
सुनना, ध्यान लगा कर सुनना–संशृणोति न चोक्तानि –भट्टि० ५।१९, ६।५, (परन्तु अकर्मक प्रयोग में आ०)–हितान्न यः संशृणुते स किं प्रभुः–कि० १।५ ।



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